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अमीर खुसरो के दोहे

खुसरो रैन सुहाग की, जागी पी के संग।   तन मेरो मन पियो को, दोउ भए एक रंग।।     खुसरो दरिया प्रेम का, उल्टी वा की धार।  जो उतरा सो डूब गया, जो डूबा सो पार।।       खीर पकायी जतन से, चरखा दिया जला।  आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा।।       गोरी सोवे सेज पर, मुख पर डारे केस।  चल खुसरो घर आपने, सांझ भयी चहु देस।। खुसरो मौला के रुठते, पीर के सरने जाय। कहे खुसरो पीर के रुठते, मौला नहिं होत सहाय।।

दुसुखने

गोश्त क्यों न खाया?   डोम क्यों न गाया?  उत्तर—गला न था  जूता पहना नहीं ,  समोसा खाया नहीं ।   उत्तर— तला न था    अनार क्यों न चखा? वज़ीर क्यों न रखा?  उत्तर— दाना न था( अनार में का दाना और दूसरा दाना  मतलब बुद्धिमान)     सौदागर को क्या चाहिए ? बूचे(बहरे) को क्या चाहिए?  उत्तर -  दो कान भी ( दुकान भी)  प्यासे को क्या चाहिए ? मिलाप को क्या चाहिए ?   उत्तर—चाह (कुआँ भी और प्यार भी)  शिकार ब चे मे बायद करद? ( शिकार किस चीज़ से करना चाहिए)  क़ुव्वते मग़्ज़ को क्या चाहिए? (दिमाग़ी ताक़त को बढ़ाने के लिए क्या चाहिए)  उत्तर— बा—दाम (जाल के साथ) और बादाम  रोटी जली क्यों? घोडा अडा क्यों? पान सडा क्यों ? उत्तर— फेरा न था पंडित प्यासा क्यों? गधा उदास क्यों ? उत्तर— लोटा न था

दोहा पहेली

उज्जवल बरन अधीन तन, एक चित्त दो ध्यान। देखत मैं तो साधु है, पर निपट पार की खान।। बगुला एक नारी के हैं दो बालक, दोनों एकहि रंग। एक फिर एक ठाढ़ा रहे, फिर भी दोनों संग। चक्की आगे-आगे बहिना आई, पीछे-पीछे भइया। दाँत निकाले बाबा आए, बुरका ओढ़े मइया।। भुट्टा चार अंगुल का पेड़, सवा मन का फ्ता। फल लागे अलग अलग, पक जाए इकट्ठा।। कुम्हार की चाक अचरज बंगला एक बनाया, बाँस न बल्ला बंधन धने।  ऊपर नींव तरे घर छाया, कहे खुसरो घर कैसे बने।। बयाँ पंछी का घोंसला माटी रौदूँ चक धर्रूँ, फेर्रूँ बारम्बर। चातुर हो तो जान ले मेरी जात गँवार।। कुम्हार गोरी सुन्दर पातली, केहर काले रंग। ग्यारह देवर छोड़ कर चली जेठ के संग।। अहरह की दाल। ऊपर से एक रंग हो और भीतर चित्तीदार। सो प्यारी बातें करे फिकर अनोखी नार।। सुपारी बाल नुचे कपड़े फटे मोती लिए उतार। यह बिपदा कैसी बनी जो नंगी कर दई नार।। भुट्टा (छल्ली)

बिन बुझ पहेली

एक नार कुँए में रहे,  वाका नीर खेत में बहे। जो कोई वाके नीर को चाखे, फिर जीवन की आस न राखे।।  तलवार एक जानवर रंग रंगीला, बिना मारे वह रोवे। उस के सिर पर तीन तिलाके, बिन बताए सोवे।।  मोर चाम मांस वाके नहीं नेक, हाड़ मास में वाके छेद। मोहि अचंभो आवत ऐसे, वामे जीव बसत है कैसे।।  पिंजड़ा स्याम बरन की है एक नारी, माथे ऊपर लागै प्यारी। जो मानुस इस अरथ को खोले, कुत्ते की वह बोली बोले।।  भौं (भौंए आँख के ऊपर होती हैं) एक गुनी ने यह गुन कीना, हरियल पिंजरे में दे दीना। देखा जादूगर का हाल, डाले हरा निकाले लाल।  पान एक थाल मोतियों से भरा, सबके सर पर औंधा धरा। चारों ओर वह थाली फिरे, मोती उससे एक न गिरे।  आसमान

अमीर खुसरो बुझ पहेली

गोल मटोल और छोटा-मोटा,   हर दम वह तो जमीं पर लोटा। खुसरो कहे नहीं है झूठा,   जो न बूझे अकिल का खोटा।।   लोटा श्याम बरन और दाँत अनेक, लचकत जैसे नारी। दोनों हाथ से खुसरो खींचे , और कहे तू आ री।।   आरी हाड़ की देही उज् रंग, लिपटा रहे नारी के संग। चोरी की ना खून किया , वाका सर क्यों काट लिया।  नाखून बाला था जब सबको भाया, बड़ा हुआ कुछ काम न आया। खुसरो कह दिया उसका नाव,   अर्थ करो नहीं छोड़ो गाँव।।  दिया नारी से तू नर भई ,  और श्याम बरन भई सोय। गली-गली कूकत फिरे , कोइलो-कोइलो लोय।।  कोयल एक नार तरवर से उतरी, सर पर वाके पांव ऐसी नार कुनार को, मैं ना देखन जाँव।।  मैंना सावन भादों बहुत चलत है , माघ पूस में थोरी। अमीर खुसरो यूँ कहें ,  तू बुझ पहेली मोरी।।  मोरी या नाली

अमीर खुसरो की उलटबासियाँ

भार भुजावन हम गए, पल्ले बाँधी ऊन कुत्ता चरखा लै गयो, काएते फटकूँगी चून । काकी फूफा घर में हैं कि नायं, नायं तो नन्देऊ पांवरो होय तो ला दे, ला कथूरा में डोराई डारि लाऊँ । खीर पकाई जतन से और चरखा दिया जलाय आयो कुत्तो खा गयो, तू बैठी ढोल बजाय, ला पानी पिलाय । भैंस चढ़ी बबूल पर और लपलप गूलर खाय दुम उठा के देखा तो पूरनमासी के तीन दिन । पीपल पकी पपेलियाँ, झड़ झड़ पड़े हैं बेर सर में लगा खटाक से, वाह रे तेरी मिठास । लखु आवे लखु जावे, बड़ो कर धम्मकला पीपर तन की न मानूँ बरतन धधरया, बड़ो कर धम्मकला । भैंस चढ़ी बबूल पर और लप लप गूलर खाए उतर उतर परमेश्वरी तेरा मठा सिरानों जाए । भैंस चढ़ी बिटोरी और लप लप गूलर खाए उतर आ मेरे साँड की, कहीं हिफ्ज न फट जाए ।