गोल मटोल और छोटा-मोटा, हर दम वह तो जमीं पर लोटा।
खुसरो कहे नहीं है झूठा, जो न बूझे अकिल का खोटा।।
लोटा
श्याम बरन और दाँत अनेक, लचकत जैसे नारी।
दोनों हाथ से खुसरो खींचे, और कहे तू आ री।।
आरी
हाड़ की देही उज् रंग, लिपटा रहे नारी के संग।
चोरी की ना खून किया, वाका सर क्यों काट लिया।
खुसरो कहे नहीं है झूठा, जो न बूझे अकिल का खोटा।।
लोटा
श्याम बरन और दाँत अनेक, लचकत जैसे नारी।
दोनों हाथ से खुसरो खींचे, और कहे तू आ री।।
आरी
हाड़ की देही उज् रंग, लिपटा रहे नारी के संग।
चोरी की ना खून किया, वाका सर क्यों काट लिया।
नाखून
बाला था जब सबको भाया, बड़ा हुआ कुछ काम न आया।
खुसरो कह दिया उसका नाव, अर्थ करो नहीं छोड़ो गाँव।।
दिया
बाला था जब सबको भाया, बड़ा हुआ कुछ काम न आया।
खुसरो कह दिया उसका नाव, अर्थ करो नहीं छोड़ो गाँव।।
दिया
नारी से तू नर भई, और श्याम बरन भई सोय।
गली-गली कूकत फिरे, कोइलो-कोइलो लोय।।
कोयल
एक नार तरवर से उतरी, सर पर वाके पांव
ऐसी नार कुनार को, मैं ना देखन जाँव।।
मैंना
सावन भादों बहुत चलत है, माघ पूस में थोरी।
अमीर खुसरो यूँ कहें, तू बुझ पहेली मोरी।।
मोरी या नाली
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