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कायर

 युवक का नाम केशव थायुवती का प्रेमा। दोनों एक ही कालेज के और एक ही क्लास के विद्यार्थी थे। केशव नये विचारों का युवक थाजात-पाँत के बन्धनों का विरोधी। प्रेमा पुराने संस्कारों की कायल थीपुरानी मर्यादाओं और प्रथाओं में पूरा विश्वास रखनेवालीलेकिन फिर भी दोनों में गाढ़ा प्रेम हो गया था। और यह बात सारे कालेज में मशहूर थी। केशव ब्राह्मण होकर भी वैश्य कन्या प्रेमा से विवाह करके अपना जीवन सार्थक करना चाहता था। उसे अपने माता-पिता की परवाह न थी। कुल-मर्यादा का विचार भी उसे स्वांग-सा लगता था। उसके लिए सत्य कोई वस्तु थीतो प्रेम थीकिन्तु प्रेमा के लिए माता-पिता और कुल-परिवार के आदेश के विरुद्ध एक कदम बढ़ाना भी असम्भव था।
सन्ध्या का समय है। विक्टोरिया-पार्क के एक निर्जन स्थान में दोनों आमने-सामने हरियाली पर बैठे हुए हैं। सैर करने वाले एक-एक करके विदा हो गयेकिन्तु ये दोनों अभी वहीं बैठे हुए हैं। उनमें एक ऐसा प्रसंग छिड़ा हुआ हैजो किसी तरह समाप्त नहीं होता।
केशव ने झुँझलाकर कहाइसका यह अर्थ है कि तुम्हें मेरी परवाह नहीं है?
प्रेमा ने उसको शान्त करने की चेष्टा करके कहातुम मेरे साथ अन्याय कर रहे होकेशव! लेकिन मैं इस विषय को माता-पिता के सामने कैसे छेड़ूंयह मेरी समझ में नहीं आता। वे लोग पुरानी रूढिय़ों के भक्त हैं। मेरी तरफ से कोई ऐसी बात सुनकर मन में जो-जो शंकाएँ होंगीउनकी तुम कल्पना कर सकते हो?
केशव ने उग्र भाव से पूछातो तुम भी उन्हीं पुरानी रूढ़ियों की गुलाम हो?
प्रेमा ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखों में मृदु-स्नेह भरकर कहानहींमैं उनकी गुलाम नहीं हूँलेकिन माता-पिता की इच्छा मेरे लिए और सब चीजों से अधिक मान्य है।
तुम्हारा व्यक्तित्व कुछ नहीं है?’
ऐसा ही समझ लो।
मैं तो समझता था कि ये ढकोसले मूर्खों के लिए ही हैंलेकिन अब मालूम हुआ कि तुम-जैसी विदुषियाँ भी उनकी पूजा करती हैं। जब मैं तुम्हारे लिए संसार को छोडऩे को तैयार हूँ तो तुमसे भी यही आशा करता हूँ।
प्रेमा ने मन में सोचामेरा अपनी देह पर क्या अधिकार है। जिन माता-पिता ने अपने रक्त से मेरी सृष्टि की हैऔर अपने स्नेह से उसे पाला हैउनकी मरजी के खिलाफ कोई काम करने का उसे कोई हक नहीं।
उसने दीनता के साथ केशव से कहाक्या प्रेम स्त्री और पुरुष के रूप ही में रह सकता हैमैत्री के रूप में नहींमैं तो आत्मा का बन्धन समझती हूँ।
केशव ने कठोर भाव से कहाइन दार्शनिक विचारों से तुम मुझे पागल कर दोगीप्रेमा! बसइतना ही समझ लो मैं निराश होकर जिन्दा नहीं रह सकता। मैं प्रत्यक्षवादी हूँऔर कल्पनाओं के संसार में प्रत्यक्ष का आनन्द उठाना मेरे लिए असम्भव है।
यह कहकर उसने प्रेमा का हाथ पकडक़र अपनी ओर खींचने की चेष्टा की। प्रेमा ने झटके से हाथ छुड़ा लिया और बोलीनहीं केशवमैं कह चुकी हूँ कि मैं स्वतन्त्र नहीं हूँ। तुम मुझसे वह चीज न माँगोजिस पर मेरा कोई अधिकार नहीं है।
केशव को अगर प्रेमा ने कठोर शब्द कहे होते तो भी उसे इतना दु:ख न हुआ होता। एक क्षण तक वह मन मारे बैठा रहा,फिर उठकर निराशा भरे स्वर में बोला—‘जैसी तुम्हारी इच्छा! अहिस्ता-अहिस्ता कदम-सा उठाता हुआ वहाँ से चला गया। प्रेमा अब भी वहीं बैठी आँसू बहाती रही।

रात को भोजन करके प्रेमा जब अपनी माँ के साथ लेटीतो उसकी आँखों में नींद न थी। केशव ने उसे एक ऐसी बात कह दी थीजो चंचल पानी में पडऩे वाली छाया की तरह उसके दिल पर छायी हुई थी। प्रतिक्षण उसका रूप बदलता था। वह उसे स्थिर न कर सकती थी। माता से इस विषय में कुछ कहे तो कैसेलज्जा मुँह बन्द कर देती थी। उसने सोचाअगर केशव के साथ मेरा विवाह न हुआ तो उस समय मेरा क्या कत्र्तव्य होगा। अगर केशव ने कुछ उद्दण्डता कर डाली तो मेरे लिए संसार में फिर क्या रह जायगालेकिन मेरा बस ही क्या है। इन भाँति-भाँति के विचारों में एक बात जो उसके मन में निश्चित हुईवह यह थी कि केशव के सिवा वह और किसी से विवाह न करेगी।
उसकी माता ने पूछाक्या तुझे अब तक नींद न आयीमैंने तुझसे कितनी बार कहा कि थोड़ा-बहुत घर का काम-काज किया करलेकिन तुझे किताबों से ही फुरसत नहीं मिलती। चार दिन में तू पराये घर जायगीकौन जाने कैसा घर मिले। अगर कुछ काम करने की आदत न रहीतो कैसे निबाह होगा?
प्रेमा ने भोलेपन से कहामैं पराये घर जाऊँगी ही क्यों?
माता ने मुस्कराकर कहालड़कियों के लिए यही तो सबसे बड़ी विपत्ति हैबेटी! माँ-बाप की गोद में पलकर ज्यों ही सयानी हुईदूसरों की हो जाती है। अगर अच्छे प्राणी मिलेतो जीवन आराम से कट गयानहीं रो-रोकर दिन काटना पड़ा। सब कुछ भाग्य के अधीन है। अपनी बिरादरी में तो मुझे कोई घर नहीं भाता। कहीं लड़कियों का आदर नहींलेकिन करना तो बिरादरी में ही पड़ेगा। न जाने यह जात-पाँत का बन्धन कब टूटेगा?
प्रेमा डरते-डरते बोलीकहीं-कहीं तो बिरादरी के बाहर भी विवाह होने लगे हैं!
उसने कहने को कह दियालेकिन उसका हृदय काँप रहा था कि माता जी कुछ भाँप न जायँ।
माता ने विस्मय के साथ पूछाक्या हिन्दुओं में ऐसा हुआ है!
फिर उसने आप-ही-आप उस प्रश्न का जवाब भी दियाऔर दो-चार जगह ऐसा हो भी गयातो उससे क्या होता है?
प्रेमा ने इसका कुछ जवाब न दियाभय हुआ कि माता कहीं उसका आशय समझ न जायँ। उसका भविष्य एक अन्धेरी खाई की तरह उसके सामने मुँह खोले खड़ा थामानों उसे निगल जायगा।
उसे न जाने कब नींद आ गयी। 


प्रात:काल प्रेमा सोकर उठीतो उसके मन में एक विचित्र साहस का उदय हो गया था। सभी महत्वपूर्ण फैसले हम आकस्मिक रूप से कर लिया करते हैंमानो कोई दैवी-शक्ति हमें उनकी ओर खींच ले जाती हैवही हालत प्रेमा की थी। कल तक वह माता-पिता के निर्णय को मान्य समझती थीपर संकट को सामने देखकर उसमें उस वायु की हिम्मत पैदा हो गयी थीजिसके सामने कोई पर्वत आ गया हो। वही मन्द वायु प्रबल वेग से पर्वत के मस्तक पर चढ़ जाती है और उसे कुचलती हुई दूसरी तरफ जा पहुँचती है। प्रेमा मन में सोच रही थीमानोयह देह माता-पिता की हैकिन्तु आत्मा तो मेरी है। मेरी आत्मा को जो कुछ भुगतना पड़ेगावह इसी देह से तो भुगतना पड़ेगा। अब वह इस विषय में संकोच करना अनुचित ही नहींघातक समझ रही थी। अपने जीवन को क्यों एक झूठे सम्मान पर बलिदान करेउसने सोचा विवाह का आधार अगर प्रेम न होतो वह देह का विक्रय है। आत्म-समर्पण क्यों बिना प्रेम के भी हो सकता हैइस कल्पना ही से कि न जाने किस अपरिचित युवक से उसका विवाह हो जायगाउसका हृदय विद्रोह कर उठा।
वह अभी नाश्ता करके कुछ पढऩे जा रही थी कि उसके पिता ने प्यार से पुकारामैं कल तुम्हारे प्रिन्सिपल के पास गया थावे तुम्हारी बड़ी तारीफ कर रहे थे।
प्रेमा ने सरल भाव से कहाआप तो यों ही कहा करते हैं।
नहींसच।
यह कहते हुए उन्होंने अपनी मेज की दराज खोलीऔर मखमली चौखटों में जड़ी हुई एक तस्वीर निकालकर उसे दिखाते हुए बोलेयह लडक़ा आयी०सी०एस० के इम्तहान में प्रथम आया है। इसका नाम तो तुमने सुना होगा?
बूढ़े पिता ने ऐसी भूमिका बाँध दी थी कि माँ उनका आशय न समझ सकी लेकिन प्रेमा भाँप गयी! उनका मन तीर की भाँति लक्ष्य पर जा पहुँचा। उसने बिना तस्वीर की ओर देखे ही कहानहींमैंने तो उसका नाम नहीं सुना।
पिता ने बनावटी आश्चर्य से कहाक्या! तुमने उसका नाम ही नहीं सुनाआज के दैनिक पत्र में उसका चित्र और जीवन-वृत्तान्त छपा है।
प्रेमा ने रुखाई से जवाब दियाहोगामगर मैं तो उस परीक्षा का कोई महत्त्व नहीं समझती। मैं तो समझती हूँजो लोग इस परीक्षा में बैठते हैं वे पल्ले सिर के स्वार्थी होते हैं। आखिर उनका उद्देश्य इसके सिवा और क्या होता है कि अपने गरीबनिर्धनदलित भाइयों पर शासन करें और खूब धन संचय करें। यह तो जीवन का कोई ऊँचा उद्देश्य नहीं है।
इस आपत्ति में जलन थीअन्याय थानिर्दयता थी। पिता जी ने समझा थाप्रेमा यह बखान सुनकर लट्टू हो जायगी। यह जवाब सुनकर तीखे स्वर में बोलेतू तो ऐसी बातें कर रही है जैसे तेरे लिए धन और अधिकार का कोई मूल्य ही नहीं।
प्रेमा ने ढिठाई से कहाहाँमैं तो इसका मूल्य नहीं समझती। मैं तो आदमी में त्याग देखती हूँ। मैं ऐसे युवकों को जानती हूँजिन्हें यह पद जबरदस्ती भी दिया जाएतो स्वीकार न करेंगे।
पिता ने उपहास के ढंग से कहायह तो आज मैंने नई बात सुनी। मैं तो देखता हूँ कि छोटी-छोटी नौकरियों के लिए लोग मारे-मारे फिरते हैं। मैं जरा उस लडक़े की सूरत देखना चाहता हूँजिसमें इतना त्याग हो। मैं तो उसकी पूजा करूँगा।
शायद किसी दूसरे अवसर पर ये शब्द सुनकर प्रेमा लज्जा से सिर झुका लेतीपर इस समय उसकी दशा उस सिपाही की सी थीजिसके पीछे गहरी खाई हो। आगे बढऩे के सिवा उसके लिए और कोई मार्ग न था। अपने आवेश को संयम से दबाती हुईआँखों में विद्रोह भरेवह अपने कमरे में गयीऔर केशव के कई चित्रों में से वह एक चित्र चुनकर लायीजो उसकी निगाह में सबसे खराब थाऔर पिता के सामने रख दिया। बूढ़े पिता जी ने चित्र को उपेक्षा के भाव से देखना चाहा;लेकिन पहली दृष्टि ही में उसने उन्हें आकर्षित कर लिया। ऊँचा कद था और दुर्बल होने पर भी उसका गठनस्वास्थ्य और संयम का परिचय दे रहा था। मुख पर प्रतिभा का तेज न थापर विचारशीलता का कुछ ऐसा प्रतिबिम्ब थाजो उसके मन में विश्वास पैदा करता था।
उन्होंने उस चित्र की ओर देखते हुए पूछायह किसका चित्र है?
प्रेमा ने संकोच से सिर झुकाकर कहायह मेरे ही क्लास में पढ़ते हैं।
अपनी ही बिरादरी का है?’
प्रेमा की मुखमुद्रा धूमिल हो गयी। इसी प्रश्न के उत्तर पर उसकी किस्मत का फैसला हो जायगा। उसके मन में पछतावा हुआ कि व्यर्थ मैं इस चित्र को यहाँ लायी। उसमें एक क्षण के लिए जो दृढ़ता आयी थीवह इस पैने प्रश्न के सामने कातर हो उठी। दबी हुई आवाज में बोली—‘जी नहींवह ब्राह्मण हैं।’ और यह कहने के साथ ही क्षुब्ध होकर कमरे से निकल गयी मानों यहाँ की वायु में उसका गला घुटा जा रहा हो और दीवार की आड़ में होकर रोने लगी।
लाला जी को तो पहले ऐसा क्रोध आया कि प्रेमा को बुलाकर साफ-साफ कह दें कि यह असम्भव है। वे उसी गुस्से में दरवाजे तक आयेलेकिन प्रेमा को रोते देखकर नम्र हो गये। इस युवक के प्रति प्रेमा के मन में क्या भाव थेयह उनसे छिपा न रहा। वे स्त्री-शिक्षा के पूरे समर्थक थेलेकिन इसके साथ ही कुल-मर्यादा की रक्षा भी करना चाहते थे। अपनी ही जाति के सुयोग्य वर के लिए अपना सर्वस्व अर्पण कर सकते थेलेकिन उस क्षेत्र के बाहर कुलीन से कुलीन और योग्य से योग्य वर की कल्पना भी उनके लिए असह्य थी। इससे बड़ा अपमान वे सोच ही न सकते थे।
उन्होंने कठोर स्वर में कहाआज से कालेज जाना बन्द कर दोअगर शिक्षा कुल-मर्यादा को डुबोना ही सिखाती हैतो कु-शिक्षा है।
प्रेमा ने कातर कण्ठ से कहापरीक्षा तो समीप आ गयी है।
लाला जी ने दृढ़ता से कहाआने दो।
और फिर अपने कमरे में जाकर विचारों में डूब गये। 


छ: महीने गुजर गये।
लाला जी ने घर में आकर पत्नी को एकान्त में बुलाया और बोलेजहाँ तक मुझे मालूम हैकेशव बहुत ही सुशील और प्रतिभाशाली युवक है। मैं तो समझता हूँ प्रेमा इस शोक में घुल-घुलकर प्राण दे देगी। तुमने भी समझायामैंने भी समझायादूसरों ने भी समझायापर उस पर कोई असर ही नहीं होता। ऐसी दशा में हमारे लिए और क्या उपाय है।
उनकी पत्नी ने चिन्तित भाव से कहाकर तो दोगेलेकिन रहोगे कहाँन जाने कहाँ से यह कुलच्छनी मेरी कोख में आयी?
लाला जी ने भवें सिकोडक़र तिरस्कार के साथ कहायह तो हजार दफा सुन चुकालेकिन कुल-मर्यादा के नाम को कहाँ तक रोएँ। चिडिय़ा का पर खोलकर यह आशा करना कि वह तुम्हारे आँगन में ही फुदकती रहेगी भ्रम है। मैंने इस पर पर ठण्डे दिल से विचार किया है और इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि हमें इस आपद्धर्म को स्वीकार कर लेना ही चाहिए। कुल-मर्यादा के नाम पर मैं प्रेमा की हत्या नहीं कर सकता। दुनिया हँसती होहँसेमगर वह जमाना बहुत जल्द आनेवाला है,जब ये सभी बन्धन टूट जाएँगे। आज भी सैकड़ों विवाह जात-पाँत के बन्धनों को तोडक़र हो चुके हैं। अगर विवाह का उद्देश्य स्त्री और पुरुष का सुखमय जीवन हैतो हम प्रेमा की उपेक्षा नहीं कर सकते हैं।
वृद्धा ने क्षुब्ध होकर कहाजब तुम्हारी यही इच्छा हैतो मुझसे क्या पूछते हैंलेकिन मैं कहे देती हूँकि मैं इस विवाह के नजदीक न जाऊँगीन कभी इस छोकरी का मुँह देखूँगीसमझ लूँगीजैसे और सब लडक़े मर गये वैसे यह भी मर गयी।
तो फिर आखिर तुम क्या करने को कहती हो?’
क्यों नहीं उस लडक़े से विवाह कर देतेउसमें क्या बुराई हैवह दो साल में सिविल सरविस पास करके आ जायगा। केशव के पास क्या रखा हैबहुत होगा किसी दफ्तर में क्लर्क हो जायगा।
और अगर प्रेमा प्राण-हत्या कर लेतो?’
तो कर लेतुम तो उसे और शह देते होजब उसे हमारी परवाह नहीं हैतो हम उसके लिए अपने नाम को क्यों कलंकित करेंप्राण-हत्या करना कोई खेल नहीं है। यह सब धमकी है। मन घोड़ा हैजब तक उसे लगाम न दोपु_े पर हाथ भी न रखने देगा। जब उसके मन का यह हाल हैतो कौन कहेकेशव के साथ ही जिन्दगी भर निबाह करेगी। जिस तरह आज उससे प्रेम हैउसी तरह कल दूसरे से हो सकता है। तो क्या पत्ते पर अपना माँस बिकवाना चाहते हो?
लालाजी ने स्त्री को प्रश्न-सूचक दृष्टि से देखकर कहाऔर अगर वह कल खुद जाकर केशव से विवाह कर लेतो तुम क्या कर लोगीफिर तुम्हारी कितनी इज्जत रह जायगी। वह चाहे संकोच-वशया हम लोगों के लिहाज से यों ही बैठी रहेपर यदि जिद पर कमर बाँध लेहम-तुम कुछ नहीं कर सकते।
इस समस्या का ऐसा भीषण अन्त भी हो सकता हैयह इस वृद्धा के ध्यान में भी न आया था। यह प्रश्न बम के गोले की तरह उसके मस्तक पर गिरा। एक क्षण तक वह अवाक्ï बैठी रह गयीमानों इस आघात ने उसकी बुद्धि की धज्जियाँ उड़ा दी हों। फिर पराभूत होकर बोलीतुम्हें अनोखी ही कल्पनाएँ सूझती हैं। मैंने तो आज तक कभी भी नहीं सुना कि किसी कुलीन कन्या ने अपनी इच्छा से विवाह किया है।
तुमने न सुना होलेकिन मैंने सुना हैऔर देखा है और ऐसा होना बहुत सम्भव है।
जिस दिन ऐसा होगाउस दिन तुम मुझे जीती न देखोगे।
मैं यह नहीं कहता कि ऐसा होगा हीलेकिन होना सम्भव है।
तो जब ऐसा होना हैतो इससे तो यही अच्छा है कि हमीं इसका प्रबन्ध करें। जब नाक ही कट रही हैतो तेज छुरी से क्यों न कटे। कल केशव को बुलाकर देखोक्या कहता है।’ 


केशव के पिता सरकारी पेन्शनर थेमिजाज के चिड़चिड़े और कृपण। धर्म के आडम्बरों में ही उनके चित्त को शान्ति मिलती थी। कल्पना-शक्ति का अभाव था। किसी के मनोभावों का सम्मान न कर सकते थे। वे अब भी उस संसार में रहते थेजिसमें उन्होंने अपने बचपन और जवानी के दिन काटे थे। नवयुग की बढ़ती हुई लहर को वे सर्वनाश कहते थे,और कम-से-कम अपने घर को दोनों हाथों और दोनों पैरों का जोर लगाकर उससे बचाए रखना चाहते थेइसलिए जब एक दिन प्रेमा के पिता उसके पास पहुँचे और केशव से प्रेमा के विवाह का प्रस्ताव कियातो बूढ़े पण्डित जी अपने आप में न रह सके। धुँधली आँखें फाडक़र बोलेआप भंग तो नहीं खा गये हैंइस तरह का सम्बन्ध और चाहे जो कुछ होविवाह नहीं है। मालूम होता हैआपको भी नये जमाने की हवा लग गयी।
बूढ़े बाबू जी ने नम्रता से कहामैं खुद ऐसा सम्बन्ध नहीं पसन्द करता। इस विषय में मेरे भी वही विचार हैंजो आपके;पर बात ऐसी आ पड़ी है कि मुझे विवश होकर आपकी सेवा में आना पड़ा। आजकल के लडक़े और लड़कियाँ कितने स्वेच्छाचारी हो गये हैंयह तो आप जानते ही हैं। हम बूढ़े लोगों के लिए अब अपने सिद्धान्तों की रक्षा करना कठिन हो गया है। मुझे भय है कि कहीं ये दोनों निराश होकर अपनी जान पर न खेल जायँ।
बूढ़े पण्डित जी जमीन पर पाँव पटकते हुए गरज उठेआप क्या कहते हैंसाहब! आपको शरम नहीं आतीहम ब्राह्मण हैं और ब्राह्मणों में भी कुलीन। ब्राह्मण कितने ही पतित हो गये होंइतने मर्यादा-शून्य नहीं हुए हैं कि बनिये-बक्कालों की लडक़ी से विवाह करते फिरें! जिस दिन कुलीन ब्राह्मणों में लड़कियाँ न रहेंगीउस दिन यह समस्या उपस्थित हो सकती है। मैं कहता हूँआपको मुझसे यह बात कहने का साहस कैसे हुआ?
बूढ़े बाबू जी जितना ही दबते थेउतना ही पण्डित जी बिगड़ते थे। यहाँ तक कि लाला जी अपना अपमान ज्यादा न सह सकेऔर अपनी तकदीर को कोसते हुए चले गये।
उसी वक्त केशव कालेज से आया। पण्डित जी ने तुरन्त उसे बुलाकर कठोर कण्ठ से कहामैंने सुना हैतुमने किसी बनिये की लडक़ी से अपना विवाह कर लिया है। यह खबर कहाँ तक सही है?
केशव ने अनजान बनकर पूछाआपसे किसने कहा?
किसी ने कहा। मैं पूछता हूँयह बात ठीक हैया नहींअगर ठीक हैऔर तुमने अपनी मर्यादा को डुबाना निश्चय कर लिया हैतो तुम्हारे लिए हमारे घर में कोई स्थान नहीं। तुम्हें मेरी कमाई का एक धेला भी नहीं मिलता। मेरे पास जो कुछ हैवह मेरी अपनी कमाई हैमुझे अख्तियार है कि मैं उसे जिसे चाहूँदे दूँ। तुम यह अनीति करके मेरे घर में कदम नहीं रख सकते।
केशव पिता के स्वभाव से परिचित था। प्रेमा से उसे प्रेम था। वह गुप्त रूप से प्रेमा से विवाह कर लेना चाहता था! बाप हमेशा तो बैठे न रहेंगे। माता के स्नेह पर उसे विश्वास था। उस प्रेम की तरंग में वह सारे कष्टों को झेलने के लिए तैयार मालूम होता थालेकिन जैसे कोई कायर सिपाही बन्दूक के सामने जाकर हिम्मत खो बैठता है और कदम पीछे हटा लेता हैवही दशा केशव की हुई। वह साधारण युवकों की तरह सिद्धान्तों के लिए बड़े-बड़े तर्क कर सकता थाजबान से उनमें अपनी भक्ति की दोहाई दे सकता थालेकिन इसके लिए यातनाएँ झेलने की सामथ्र्य उसमें न थीं। अगर वह अपनी जिद पर अड़ा और पिता ने भी अपनी टेक रखीतो उसका कहाँ ठिकाना लगेगाउसका जीवन ही नष्ट हो जायगा।
उसने दबी जबान से कहाजिसने आपसे यह कहा हैबिल्कुल झूठ कहा है।
पण्डित जी ने तीव्र नेत्रों से देखकर कहातो यह खबर बिलकुल गलत है?
जी हाँबिलकुल गलत।
तो तुम आज ही इसी वक्त उस बनिये को खत लिख दो और याद रखो कि अगर इस तरह की चर्चा फिर कभी उठीतो तुम्हारा सबसे बड़ा शत्रु होऊँगा। बसजाओ।
केशव और कुछ न कह सका। वह यहाँ से चलातो ऐसा मालूम होता था कि पैरों में दम नहीं है।



दूसरे दिन प्रेमा ने केशव के नाम यह पत्र लिखा

प्रिय केशव!
तुम्हारे पूज्य पिताजी ने लाला जी के साथ जो अशिष्ट और अपमानजनक व्यवहार किया हैउसका हाल सुनकर मेरे मन में बड़ी शंका उत्पन्न हो रही है। शायद उन्होंने तुम्हें भी डाँट-फटकार बतायी होगीऐसी दशा में मैं तुम्हारा निश्चय सुनने के लिए विकल हो रही हूँ। तुम्हारे साथ हर तरह का कष्ट झेलने को तैयार हूँ। मुझे तुम्हारे पिताजी की सम्पत्ति का मोह नहीं हैमैं तो केवल तुम्हारा प्रेम चाहती हूँ और उसी में प्रसन्न हूँ। आज शाम को यहीं आकर भोजन करो। दादा और माँ दोनों तुमसे मिलने के लिए बहुत इच्छुक हैं। मैं वह स्वप्न देखने में मग्न हूँ जब हम दोनों उस सूत्र में बँध जायँगेजो टूटना नहीं जानता। जो बड़ी-से-बड़ी आपत्ति में भी अटूट रहता है।
तुम्हारी
प्रेमा!

सन्ध्या हो गयी और इस पत्र का कोई जवाब न आया। उसकी माता बार-बार पूछती थीकेशव आये नहींबूढ़े लाला भी द्वार की ओर आँख लगाये बैठे थे। यहाँ तक कि रात के नौ बज गयेपर न तो केशव ही आयेन उनका पत्र।
प्रेमा के मन में भाँति-भाँति के संकल्प-विकल्प उठ रहे थेकदाचित उन्हें पत्र लिखने का अवकाश न मिला होगाया आज आने की फुरसत न मिली होगीकल अवश्य आ जाएँगे। केशव ने पहले उसके पास जो प्रेम-पत्र लिखे थेउन सबको उसने फिर पढ़ा। उनके एक-एक शब्द से कितना अनुराग टपक रहा थाउनमें कितना कम्पन थाकितनी विकलताकितनी तीव्र आकांक्षा! फिर उसे केशव के वे वाक्य याद आएजो उसने सैकड़ों ही बार कहे थे। कितनी बार वह उसके सामने रोया था। इतने प्रमाणों के होते हुए निराशा के लिए कहाँ स्थान थामगर फिर भी सारी रात उसका मन जैसे सूली पर टँगा रहा।
प्रात:काल केशव का जवाब आया। प्रेमा ने काँपते हुए हाथों से पत्र लेकर पढ़ा। पत्र हाथ से गिर गया। ऐसा जान पड़ामानो उसकी देह का रक्त स्थिर हो गया हो। लिखा था
मैं बड़े संकट में हूँकि तुम्हें क्या जवाब दूँ! मैंने इधर इस समस्या पर खूब ठण्डे दिल से विचार किया है और इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि वर्तमान दशाओं में मेरे लिए पिता की आज्ञा की उपेक्षा करना दु:सह है। मुझे कायर न समझना। मैं स्वार्थी भी नहीं हूँलेकिन मेरे सामने जो बाधाएँ हैं उन पर विजय पाने की शक्ति मुझमें नहीं है। पुरानी बातों को भूल जाओ। उस समय मैंने इन बाधाओं की कल्पना न की थी!
प्रेमा ने एक लम्बीगहरीजलती हुई साँस खींची और उस खत को फाडक़र फेंक दिया। उसकी आँखों से अश्रुधार बहने लगी। जिस केशव को उसने अपने अन्त:करण से वर लिया थावह इतना निष्ठुर हो जायगाइसकी उसको रत्ती भर भी आशा न थी। ऐसा मालूम पड़ामानोअब तक वह कोई सुनहला स्वप्न देख रही थीपर आँख खुलने पर वह सब कुछ अदृश्य हो गया। जीवन में जब आशा ही लुप्त हो गयीतो अब अन्धकार के सिवा और क्या रहा! अपने हृदय की सारी सम्पत्ति लगाकर उसने एक नाव लदवायी थीवह नाव जलमग्न हो गयी। अब दूसरी नाव कौन वहाँ से लदवायेअगर वह नाव टूटी है तो उसके साथ वह भी डूब जायगी।
माता ने पूछाक्या केशव का पत्र है?
प्रेमा ने भूमि की ओर ताकते हुए कहाहाँउनकी तबीयत अच्छी नहीं हैइसके सिवा वह और क्या कहेकेशव की निष्ठुरता और बेवफाई का समाचार कहकर लज्जित होने का साहस उसमें न था।
दिन भर वह घर के काम-धन्धों में लगी रहीमानो उसे कोई चिन्ता ही नहीं है। रात को उसने सबको भोजन करायाखुद भी भोजन किया और बड़ी देर हारमोनियम पर गाती रही।
मगर सबेरा हुआतो उसके कमरे में उसकी लाश पड़ी हुई थी। प्रभात की सुनहरी किरणें उसके पीले मुख को जीवन की आभा प्रदान कर रही थीं।

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ज ल्दी से मालदार हो जाने की हवस किसे नहीं होती  ?  उन दिनों जब लॉटरी के टिकट आये ,  तो मेरे दोस्त ,  वि क्रम के पिता ,  चचा ,  अम्मा ,  और भाई ,  सभी ने एक-एक टिकट खरीद लिया। कौन जाने ,  किसकी तकदीर जोर करे  ?  किसी के नाम आये ,  रुपया रहेगा तो घर में ही। मगर वि क्रम को सब्र न हुआ। औरों के नाम रुपये आयेंगे ,  फिर उसे कौन पूछता है  ?  बहुत होगा ,  दस-पाँच हजार उसे दे देंगे। इतने रुपयों में उसका क्या होगा  ?  उसकी जिन्दगी में बड़े-बड़े मंसूबे थे। पहले तो उसे सम्पूर्ण जगत की यात्रा करनी थी ,  एक-एक कोने की। पीरू और ब्राजील और टिम्बकटू और होनोलूलू ,  ये सब उसके प्रोग्राम में थे। वह आँधी की तरह महीने-दो-महीने उड़कर लौट आनेवालों में न था। वह एक-एक स्थान में कई-कई दिन ठहरकर वहाँ के रहन-सहन ,  रीति-रिवाज आदि का अध्ययन करना और संसार-यात्रा का एक वृहद् ग्रंथ लिखना चाहता था। फिर उसे एक बहुत बड़ा पुस्तकालय बनवाना था ,  जिसमें दुनिया-भर की उत्तम रचनाएँ जमा की जायँ। पुस्तकालय के लिए वह दो ल...

स्वर्ग की देवी

भाग्य की बात! शादी-विवाह में आदमी का क्या अख्तियार! जिससे ईश्वर ने, या उनके नायबों- ब्राह्मणों ने तय कर दी, उससे हो गयी। बाबू भारतदास ने लीला के लिए सुयोग्य वर खोजने में कोई बात उठा नहीं रखी। लेकिन जैसा घर-वर चाहते थे, वैसा न पा सके। वह लड़की को सुखी देखना चाहते थे, जैसा हर एक पिता का धर्म है; किंतु इसके लिए उनकी समझ में सम्पत्ति ही सबसे जरूरी चीज थी। चरित्र या शिक्षा का स्थान गौण था। चरित्र तो किसी के माथे पर लिखा नहीं रहता और शिक्षा का आजकल के जमाने में मूल्य ही क्या? हाँ, सम्पत्ति के साथ शिक्षा भी हो तो क्या पूछना! ऐसा घर उन्होंने बहुत ढूँढ़ा, पर न मिला। ऐसे घर हैं ही कितने जहाँ दोनों पदार्थ मिलें? दो-चार मिले भी तो अपनी बिरादरी के न थे। बिरादरी भी मिली, तो ज़ायजा न मिला; जायजा भी मिला तो शर्तें तय न हो सकीं। इस तरह मजबूर होकर भारतदास को लीला का विवाह लाला सन्तसरन के लड़के सीतासरन से करना पड़ा। अपने बाप का इकलौता बेटा था, थोड़ी-बहुत शिक्षा भी पायी थी, बातचीत सलीके से करता था, मामले-मुकदमे समझता था और जरा दिल का रँगीला भी था। सबसे बड़ी बात यह थी कि रूपवान, बलिष्ठ, प्रसन्न-मुख, साहसी आदमी ...