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शूद्रा


मां और बेटी एक झोंपड़ी में गांव के उसे सिरे पर रहती थीं। बेटी बाग से पत्तियां बटोर लातीमां भाड़-झोंकती। यही उनकी जीविका थी। सेर-दो सेर अनाज मिल जाता थाखाकर पड़ रहती थीं। माता विधवा थाबेटी क्वांरीघर में और कोई आदमी न था। मां का नाम गंगा थाबेटी का गौरा!
गंगा को कई साल से यह चिन्ता लगी हुई थी कि कहीं गौरा की सगाई हो जायलेकिन कहीं बात पक्की न होती थी। अपने पति के मर जाने के बाद गंगा ने कोई दूसरा घर न किया थान कोई दूसरा धन्धा ही करती थी। इससे लोगों को संदेह हो गया था कि आखिर इसका गुजर कैसे होता है! और लोग तो छाती फाड़-फाड़कर काम करते हैंफिर भी पेट-भर अन्न मयस्सर नहीं होता। यह स्त्री कोई धंधा नहीं करतीफिर भी मां-बेटी आराम से रहती हैंकिसी के सामने हाथ नहीं फैलातीं। इसमें कुछ-न-कुछ रहस्य अवश्य है। धीरे-धीरे यह संदेह और भी द़ृढ़ हो गया और अब तक जीवित था। बिरादरी में कोई गौरा से सगाई करने पर राजी न होता था। शूद्रों की बिरादरी बहुत छोटी होती है। दस-पांच कोस से अधिक उसका क्षेत्र नहीं होताइसीलिए एक दूसरे के गुण-दोष किसी से छिपे नहीं रहतेउन पर परदा ही डाला जा सकता है। 
इस भ्रांति को शान्त करने के लिए मां ने बेटी के साथ कई तीर्थ-यात्राएं कीं। उड़ीसा तक हो आयीलेकिन संदेह न मिटा। गौरा युवती थीसुन्दरी थीपर उसे किसी ने कुएं पर या खेतों में हंसते-बोलते नहीं देखा। उसकी निगाह कभी ऊपर उठती ही न थी। लेकिन ये बातें भी संदेह को और पुष्ट करती थीं। अवश्य कोई- न- कोई रहस्य है। कोई युवती इतनी सती नहीं हो सकती। कुछ गुप-चुप की बात अवश्य है। 
यों ही दिन गुजरते जाते थे। बुढ़िया दिनोंदिन चिन्ता से घुल रही थी। उधर सुन्दरी की मुख-छवि दिनोंदिन निहरती जाती थी। कली खिल कर फूल हो रही थी। 

एक दिन एक परदेशी गांव से होकर निकला। दस-बारह कोस से आ रहा था। नौकरी की खोज में कलकत्ता जा रहा था। रात हो गयी। किसी कहार का घर पूछता हुआ गंगा के घर आया। गंगा ने उसका खूब आदर-सत्कार कियाउसके लिए गेहूं का आटा लायीघर से बरतन निकालकर दिये। कहार ने पकायाखायालेटाबातें होने लगीं। सगाई की चर्चा छिड़ गयी। कहार जवान थागौरा पर निगाह पड़ीउसका रंग-ढंग देखाउसकी सजल छवि ऑंखों में खुब गयी। सगाई करने पर राजी हो गया। लौटकर घर चला गया। दो-चार गहने अपनी बहन के यहां से लायागांव के बजाज ने कपड़े उधार दे दिये। दो-चार भाईबंदों के साथ सगाई करने आ पहुंचा। सगाई हो गयीयही रहने लगा। गंगा बेटी और दामाद को आंखों से दूर न कर सकती थी।
परन्तु दस ही पांच दिनों में मंगरु के कानों में इधर-उधर की बातें पड़ने लगीं। सिर्फ बिरादरी ही के नहींअन्य जाति वाले भी उनके कान भरने लगे। ये बातें सुन-सुन कर मंगरु पछताता था कि नाहक यहां फंसा। पर गौरा को छोड़ने का ख्याल कर उसका दिल कांप उठता था। 
एक महीने के बाद मं गरु अपनी बहन के गहने लौटाने गया। खाने के समय उसका बहनोई उसके साथ भोजन करने न बैठा। मंगरु को कुछ संदेह हुआबहनोई से बोला- तुम क्यों नहीं आते?बहनोई ने कहा-तुम खा लोमैं फिर खा लूंगा। 
मंगरु – बात क्या हैतु खाने क्यों नहीं उठते? बहनोई जब तक पंचायत न होगीमैं तुम्हारे साथ कैसे खा सकता हूंतुम्हारे लिए बिरादरी भी नहीं छोड़ दूंगा। किसी से पूछा न गाछाजाकर एक हरजाई से सगाई कर ली। 
मंगरु चौके पर उठ आयामिरजई पहनी और ससुराल चला आया। बहन खड़ी रोती रह गयी। 
उसी रात को वह किसी वह किसी से कुछ कहे-सुने बगैरगौरा को छोड़कर कहीं चला गया। गौरा नींद में मग्न थी। उसे क्या खबर थी कि वह रत्नजो मैंने इतनी तपस्या के बाद पाया हैमुझे सदा के लिए छोड़े चला जा रहा है। 

कई साल बीत गये। मंगरु का कुछ पता न चला। कोई पत्र तक न आयापर गौरा बहुत प्रसन्न थी। वह मांग में सेंदुर डालतीरंग बिरंग के कपड़े पहनती और अधरों पर मिस्सी के धड़े जमाती। मंगरु भजनों की एक पुरानी किताब छोड़ गया था। उसे कभी-कभी पढ़ती और गाती। मंगरु ने उसे हिन्दी सिखा दी थी। टटोल-टटोल कर भजन पढ़ लेती थी। 
पहले वह अकेली बैठली रहती। गांव की और स्त्रियों के साथ बोलते-चालते उसे शर्म आती थी। उसके पास वह वस्तु न थीजिस पर दूसरी स्त्रियां गर्व करती थीं। सभी अपने-अपने पति की चर्चा करतीं। गौरा के पति कहां थावह किसकी बातें करती! अब उसके भी पति था। अब वह अन्य स्त्रियों के साथ इस विषय पर बातचीत करने की अधिकारिणी थी। वह भी मंगरु की चर्चा करतीमंगरु कितना स्नेहशील हैकितना सज्जनकितना वीर। पति चर्चा से उसे कभी तृप्ति ही न होती थी। 
स्त्रियां- मंगरु तुम्हें छोड़कर क्यों चले गये?गौरी कहती – क्या करतेमर्द कभी ससुराल में पड़ा रहता है। देश परदेश में निकलकर चार पैसे कमाना ही तो मर्दों का काम हैनहीं तो मान-मरजादा का निर्वाह कैसे हो?जब कोई पूछताचिट्ठ-पत्री क्यों नहीं भेजतेतो हंसकर कहती- अपना पता-ठिकाना बताने में डरते हैं। जानते हैं नगौरा आकर सिर पर सवार हो जायेगी। सच कहती हूं उनका पता-ठिकाना मालूम हो जायेतो यहां मुझसे एक दिन भी न रहा जाये। वह बहुत अच्छा करते हैं कि मेरे पास चिट्ठी-पत्री नहीं भेजते। बेचारे परदेश में कहां घर गिरस्ती संभालते फिरेंगे?एक दिन किसी सहेली ने कहा- हम न मानेंगेतुझसे जरुर मंगरु से झगड़ा हो गया हैनहीं तो बिना कुछ कहे-सुने क्यों चले जाते ?गौरा ने हंसकर कहा- बहनअपने देवता से भी कोई झगड़ा करता हैवह मेरे मालिक हैंभला मैं उनसे झगड़ा करुंगीजिस दिन झगड़े की नौबत आयेगीकहीं डूब मरुंगी। मुझसे कहकर जाने पातेमैं उनके पैरों से लिपट न जाती। 

एक दिन कलकत्ता से एक आदमी आकर गंगा के घर ठहरा। पास ही के किसी गांव में अपना घर बताया। कलकत्ता में वह मंगरु के पड़ोस ही में रहता था। मंगरु ने उससे गौरा को अपने साथ लाने को कहा था। दो साड़ियां और राह-खर्च के लिये रुपये भी भेजे थे। गौरा फूली न समायी। बूढ़े ब्राह्मण के साथ चलने को तैयार हो गयी। चलते वक्त वह गांव की सब औरतों से गले मिली। गंगा उसे स्टेशन तक पहुंचाने गयी। सब कहते थेबेचारी लड़की के भाग जग गयेनहीं तो यहाँ कुढ़-कुढ़ कर मर जाती। 
रास्ते-भर गौरा सोचती – न जाने वह कैसे हो गये होंगे अब तो मूछें अच्छी तरह निकल आयी होंगी। परदेश में आदमी सुख से रहता है। देह भर आयी होगी। बाबू साहब हो गये होंगे। मैं पहले दो-तीन दिन उनसे बोलूंगी नहीं। फिर पूछूंगी-तुम मुझे छोड़कर क्यों चले गयेअगर किसी ने मेरे बारें में कुछ बुरा-भला कहा ही थातो तुमने उसका विश्वास क्यों कर लियातुम अपनी आंखों से न देखकर दूसरों के कहने पर क्यों गयेमैं भली हूं या बूरी हूंहूं तो तुम्हारीतुमने मुझे इतने दिनों रुलाया क्योतुम्हारे बारे में अगर इसी तरह कोई मुझसे कहतातो क्या मैं तुमको छोड़ देतीजब तुमने मेरी बांह पकड़ लीतो तुम मेरे हो गये। फिर तुममें लाख एब होंमेरी बला से। चाहे तुम तुर्क ही क्यों न हो जाओमैं तुम्हें छोड़ नहीं सकती। तुम क्यों मुझे छोड़कर भागेक्या समझते थेभागना सहज हैआखिर झख मारकर बुलाया कि नहींकैसे न बुलातेमैंने तो तुम्हारे ऊपर दया कीकि चली आयी,नहीं तो कह देती कि मैं ऐसे निर्दयी के पास नहीं जातीतो तुम आप दौड़े आते। तप करने से देवता भी मिल जाते हैंआकर सामने खड़े हो जाते हैंतुम कैसे न आतेवह धरती बार-बार उद्विग्न हो-होकर बूढ़े ब्राह्मण से पूछतीअब कितनी दूर हैधरती के छोर पर रहते हैं क्याऔर भी कितनी ही बातें वह पूछना चाहती थीलेकिन संकोच-वश न पूछ सकती थी। मन-ही-मन अनुमान करके अपने को सन्तुष्ट कर लेती थी। उनका मकान बड़ा-सा होगाशहर में लोग पक्के घरों में रहते हैं। जब उनका साहब इतना मानता हैतो नौकर भी होगा। मैं नौकर को भगा दूंगी। मैं दिन-भर पड़ेपड़े क्या किया करूंगी?बीच-बीच में उसे घर की याद भी आ जाती थी। बेचारी अम्मा रोती होंगी। अब उन्हें घर का सारा काम आप ही करना पड़ेगा। न जाने बकरियों को चराने ले जाती है। या नहीं। बेचारी दिन-भर में-में करती होंगी। मैं अपनी बकरियों के लिए महीने-महीने रुपये भेजूंगी। जब कलकत्ता से लौटूंगी तब सबके लिए साड़ियां लाऊंगी। तब मैं इस तरह थोड़े लौटूंगी। मेरे साथ बहुत-सा असबाब होगा। सबके लिए कोई-न-कोई सौगात लाऊंगी। तब तक तो बहुत-सी बकरियां हो जायेंगी। 
यही सुख स्वप्न देखते-देखते गौरा ने सारा रास्ता काट दिया। पगली क्या जानती थी कि मेरे मान कुछ और कर्त्ता के मन कुछ और। क्या जानती थी कि बूढ़े ब्राह्मणों के भेष में पिशाच होते हैं। मन की मिठाई खाने में मग्न थी। 

ती
सरे दिन गाड़ी कलकत्ता पहुंची। गौरा की छाती धड़-धड़ करने लगी। वह यहीं-कहीं खड़े होंगें। अब आते हीं होंगे। यह सोचकर उसने घूंघट निकाल लिया और संभल बैठी। मगर मगरु वहां न दिखाई दिया। बूढ़ा ब्राह्मण बोला-मंगरु तो यहां नहीं दिखाई देतामैं चारों ओर छान आया। शायद किसी काम में लग गया होगाआने की छुट्टी न मिली होगीमालूम भी तो न था कि हम लोग किसी गाड़ी से आ रहे हैं। उनकी राह क्यों देखेंचलोडेरे पर चलें। 
दोनों गाड़ी पर बैठकर चले। गौरा कभी तांगे पर सवार न हुई थी। उसे गर्व हो रहा था कि कितने ही बाबू लोग पैदल जा रहे हैंमैं तांगे पर बैठी हूं। 
एक क्षण में गाड़ी मंगरु के डेरे पर पहुंच गयी। एक विशाल भवन थाआहाता साफ-सुथरासायबान में फूलों के गमले रखे हुए थे। ऊपर चढ़ने लगीविस्मयआनन्द और आशा से। उसे अपनी सुधि ही न थी। सीढ़ियों पर चढ़तेचढ़ते पैर दुखने लगे। यह सारा महल उनका है। किराया बहुत देना पड़ता होगा। रुपये को तो वह कुछ समझते ही नहीं। उसका हृदय धड़क रहा था कि कहीं मंगरु ऊपर से उतरते आ न रहें हों सीढ़ी पर भेंट हो गयीतो मैं क्या करुंगीभगवान करे वह पड़े सोते रहे होंतब मैं जगाऊं और वह मुझे देखते ही हड़बड़ा कर उठ बैठें। आखिर सीढ़ियों का अन्त हुआ। ऊपर एक कमरें में गौरा को ले जाकर ब्राह्मण देवता ने बैठा दिया। यही मंगरु का डेरा था। मगर मंगरु यहां भी नदारद! कोठरी में केवल एक खाट पड़ी हुई थी। एक किनारे दो-चार बरतन रखे हुए थे। यही उनकी कोठरी है। तो मकान किसी दूसरे का हैउन्होंने यह कोठरी किराये पर ली होगी। मालूम होता है,रात को बाजार में पूरियां खाकर सो रहे होंगे। यही उनके सोने की खाट है। एक किनारे घड़ा रखा हुआ था। गौरा को मारे प्यास के तालू सूख रहा था। घड़े से पानी उड़ेल कर पिया। एक किनारे पर एक झाडू रखा था। गौरा रास्ते की थकी थीपर प्रेम्मोल्लास में थकन कहांउसने कोठरी में झाडू लगायाबरतनों को धो-धोकर एक जगह रखा। कोठरी की एक-एक वस्तु यहां तक कि उसकी फर्श और दीवारों में उसे आत्मीयता की झलक दिखायी देती थी। उस घर में भीजहां उसे अपने जीवन के २५ वर्ष काटे थेउसे अधिकार का ऐसा गौरव-युक्त आनन्द न प्राप्त हुआ था। 
मगर उस कोठरी में बैठे-बैठे उसे संध्या हो गयी और मंगरु का कहीं पता नहीं। अब छुट्टी मिली होगी। सांझ को सब जगह छुट्टी होती है। अब वह आ रहे होंगे। मगर बूढ़े बाबा ने उनसे कह तो दिया ही होगावह क्या अपने साहब से थोड़ी देर की छुट्टी न ले सकते थेकोई बात होगीतभी तो नहीं आये। 
अंधेरा हो गया। कोठरी में दीपक न था। गौरा द्वार पर खड़ी पति की बाट देख रहीं थी। जाने पर बहुत-से आदमियों के चढ़ते-उतरने की आहट मिलती थीबार-बार गौरा को मालूम होता था कि वह आ रहे हैंपर इधर कोई नहीं आता था। 
नौ बजे बूढ़े बाबा आये। गौरी ने समझामंगरु है। झटपट कोठरी के बाहर निकल आयी। देखा तो ब्राह्मण! बोली-वह कहां रह गये? बूढ़ाउनकी तो यहां से बदली हो गयी। दफ्तर में गया था तो मालूम हुआ कि वह अपने साहब के साथ यहां से कोई आठ दिन की राह पर चले गये। उन्होंने साहब से बहुत हाथ-पैर जोड़े कि मुझे दस दिन की मुहलत दे दीजिएलेकिन साहब ने एक न मानी। मंगरु यहां लोगों से कह गये हैं कि घर के लोग आयें तो मेरे पास भेज देना। अपना पता दे गये हैं। कल मैं तुम्हें यहां से जहाज पर बैठा दूंगा। उस जहाज पर हमारे देश के और भी बहुत से होंगेइसलिए मार्ग में कोई कष्ट न होगा। 
गौरा ने पूछा- कै दिन में जहाज पहुंचेगा?बूढ़ा- आठ-दस दिन से कम न लगेंगेमगर घबराने की कोई बात नहीं। तुम्हें किसी बात की तकलीफ न होगी।

अब तक गौरा को अपने गांव लौटने की आशा थी। कभी-न-कभी वह अपने पति को वहां अवश्य खींच ले जायेगी। लेकिन जहाज पर बैठाकर उसे ऐसा मालूम हुआ कि अब फिर माता को न देखूंगीफिर गांव के दर्शन न होंगेदेश से सदा के लिए नाता टूट रहा है। देर तक घाट पर खड़ी रोती रहीजहाज और समुद्र देखकर उसे भय हो रहा था। हृदय दहल जाता था। 
शाम को जहाज खुला। उस समय गौरा का हृदय एक अक्षय भय से चंचल हो उठा। थोड़ी देर के लिए नैराश्य न उस पर अपना आतंक जमा लिया। न-जाने किस देश जा रही हूं,उनसे भेंट भी होगी या नहीं। उन्हें कहां खोजती फिरुंगीकोई पता-ठिकाना भी तो नहीं मालूम। बार-बार पछताती थी कि एक दिन पहिले क्यों न चली आयी। कलकत्ता में भेंट हो जाती तो मैं उन्हें वहां कभी न जाने देती। 
जहाज पर और कितने ही मुसाफिर थेकुछ स्त्रियां भी थीं। उनमें बराबर गाली-गलौज होती रहती थी। इसलिए गौरा को उनसें बातें करने की इच्छा न होती थी। केवल एक स्त्री उदास दिखाई देती थी। गौरा ने उससे पूछा-तुम कहां जाती हो बहन? उस स्त्री की बड़ी-बड़ी आंखे सजल हो गयीं। बोलींकहां बताऊं बहन कहां जा रहीं हूंजहां भाग्य लिये जाता हैवहीं जा रहीं हूं। तुम कहां जाती हो?गौरा- मैं तो अपने मालिक के पास जा रही हूं। जहां यह जहाज रुकेगा। वह वहीं नौकर हैं। मैं कल आ जाती तो उनसे कलकत्ता में ही भेंट हो जाती। आने में देर हो गयी। क्या जानती थी कि वह इतनी दूर चले जायेंगेनहीं तो क्यों देर करती! 
स्त्री – अरे बहनकहीं तुम्हें भी तो कोई बहकाकर नहीं लाया हैतुम घर से किसके साथ आयी हो?गौरा – मेरे आदमी ने कलकत्ता से आदमी भेजकार मुझे बुलाया था। 
स्त्री – वह आदमी तुम्हारा जानपहचान का था?गौरा- नहींउस तरफ का एक बूढ़ा ब्राह्मण था। 
स्त्री – वही लम्बा-सादुबला-पतला लकलक बूढ़ाजिसकी एक ऑंख में फूली पड़ी हुई है। 
गौरा – हांहांवही। क्या तुम उसे जानती हो?स्त्री – उसी दुष्ट ने तो मेरा भी सर्वनाश किया। ईश्वर करेउसकी सातों पुश्तें नरक भोगेंउसका निर्वश हो जायेकोई पानी देनेवाला भी न रहेकोढ़ी होकर मरे। मैं अपना वृतान्त सुनाऊं तो तुम समझेगी कि झूठ है। किसी को विश्वास न आयगा। क्या कहूंबस सही समझ लो कि इसके कारण मैं न घर की रह गयीन घाट की। किसी को मुंह नहीं दिखा सकती। मगर जान तो बड़ी प्यार होती है। मिरिच के देश जा रही हूं कि वहीं मेहनत-मजदूरी करके जीवन के दिन काटूं। 
गौरा के प्राण नहीं में समा गये। मालूम हुआ जहाज अथाह जल में डूबा जा रहा है। समझ गयी बूढ़े ब्राह्मण ने दगा की। अपने गांव में सुना करती थी कि गरीब लोग मिरिच में भरती होने के लिए जाया करते हैं। मगर जो वहां जाता हैवह फिर नहीं लौटता। हेभगवान् तुमने मुझे किस पाप का यह दण्ड दियाबोली- यह सब क्यों लोगों को इस तरह छलकर मिरिच भेजते हैं?स्त्री- रुपये के लोभ से और किसलिएसुनती हूंआदमी पीछे इन सभी को कुछ रुपये मिलते हैं। 
गौरा – मजूरी
गौरा सोचने लगी – अब क्या करुंयह आशा नौका जिस पर बैठी हुई वह चली जा रही थीटुट गयी थी और अब समुद्र की लहरों के सिवा उसकी रक्षा करने वाला कोई न था। जिस आधार पर उसने अपना जीवन-भवन बनाया थावह जलमग्न हो गया। अब उसके लिए जल के सिवा और कहां आश्रय हैउसकी अपनी माता कीअपने घर की अपने गांव कीसहेलियों की याद आती और ऐसी घोर मर्म वेदना होने लगीमानो कोई सर्प अन्तस्तल में बैठा हुआबार-बार डस रहा हो। भगवान! अगर मुझे यही यातना देनी थी तो तुमने जन्म ही क्यों दिया थातुम्हें दुखिया पर दया नहीं आतीजो पिसे हुए हैं उन्हीं को पीसते हो! करुण स्वर से बोली – तो अब क्या करना होगा बहन? स्त्री – यह तो वहां पहुंच कर मालूम होगा। अगर मजूरी ही करनी पड़ी तो कोई बात नहींलेकिन अगर किसी ने कुदृष्टि से देखा तो मैंने निश्चय कर लिया है कि या तो उसी के प्राण ले लूंगी या अपने प्राण दे दूंगी। 
यह कहते-कहते उसे अपना वृतान्त सुनाने की वह उत्कट इच्छा हुईजो दुखियों को हुआ करती है। बोली – मैं बड़े घर की बेटी और उससे भी बड़े घर की बहूं हूंपर अभागिनी ! विवाह के तीसरे ही साल पतिदेव का देहान्त हो गया। चित्त की कुछ ऐसी दशा हो गयी कि नित्य मालूम होता कि वह मुझे बुला रहे हैं। पहले तो ऑंख झपकते ही उनकी मूर्ति सामने आ जाती थीलेकिन फिर तो यह दशा हो गयी कि जाग्रत दशा में भी रह-रह कर उनके दर्शन होने लगे। बस यही जान पड़ता था कि वह साक्षात् खड़े बुला रहे हैं। किसी से शर्म के मारे कहती न थीपर मन में यह शंका होती थी कि जब उनका देहावसान हो गया है तो वह मुझे दिखाई कैसे देते हैंमैं इसे भ्रान्ति समझकर चित्त को शान्त न कर सकती। मन कहता थाजो वस्तु प्रत्यक्ष दिखायी देती हैवह मिल क्यों नहीं सकतीकेवल वह ज्ञान चाहिए। साधु-महात्माओं को सिवा ज्ञान और कौन दे सकता हैमेरा तो अब भी विश्वास है कि अभी ऐसी क्रियाएं हैंजिनसे हम मरे हुए प्राणियों से बातचीत कर सकते हैंउनको स्थूल रुप में देख सकते हैं। महात्माओं की खोज में रहने लगी। मेरे यहां अक्सर साधु-सन्त आते थेउनसे एकान्त में इस विषय में बातें किया करती थीपर वे लोग सदुपदेश देकर मुझे टाल देते थे। मुझे सदुपदेशों की जरुरत न थी। मैं वैधव्य-धर्म खूब जानती थी। मैं तो वह ज्ञान चाहती थी जो जीवन और मरण के बीच का परदा उठा दे। तीन साल तक मैं इसी खेल में लगी रही। दो महीने होते हैंवही बूढ़ा ब्राह्मण संन्यासी बना हुआ मेरे यहां जा पहुंचा। मैंने इससे वही भिक्षा मांगी। इस धूर्त ने कुछ ऐसा मायाजाल फैलाया कि मैं आंखे रहते हुए भी फंस गयी। अब सोचती हूं तो अपने ऊपर आश्चर्य होता है कि मुझे उसकी बातों पर इतना विश्वास क्यों हुआमैं पति-दर्शन के लिए सब कुछ झेलने कोसब कुछ करने को तैयार थी। इसने रात को अपने पास बुलाया। मैं घरवालों से पड़ोसिन के घर जाने का बहाना करके इसके पास गयी। एक पीपल से इसकी धूईं जल रही थी। उस विमल चांदनी में यह जटाधारी ज्ञान और योग का देवता-सा मालूम होता था। मैं आकर धूईं के पास खड़ी हो गयी। उस समय यदि बाबाजी मुझे आग में कुद पड़ने की आज्ञा देतेतो मैं तुरन्त कूद पड़ती। इसने मुझे बड़े प्रेम से बैठाया और मेरे सिर पर हाथ रखकर न जाने क्या कर दिया कि मैं बेसुध हो गयी। फिर मुझे कुछ नहीं मालूम कि मैं कहां गयीक्या हुआजब मुझे होश आया तो मैं रेल पर सवार थी। जी में आया कि चिल्लाऊंपर यह सोचकर कि अब गाड़ी रुक भी गयी और मैं उतर भी पड़ी तो घर में घुसने न पाऊंगीमैं चुपचाप बैठी रह गई। मैं परमात्मा की दृष्टि से निर्दोष थीपर संसार की दृष्टि में कलंकित हो चुकी थी। रात को किसी युवती का घर से निकल जाना कलंकित करने के लिए काफी था। जब मुझे मालूम हो गया कि सब मुझे टापू में भेज रहें हैं तो मैंने जरा भी आपत्ति नहीं की। मेरे लिए अब सारा संसार एक-सा है। जिसका संसार में कोई न होउसके लिए देश-परदेश दोनों बराबर है। हांयह पक्का निश्चय कर चूकी हूं कि मरते दम तक अपने सत की रक्षा करुंगी। विधि के हाथ में मृत्यु से बढ़ कर कोई यातना नहीं। विधवा के लिए मृत्यु का क्या भय। उसका तो जीना और मरना दोनों बराबर हैं। बल्कि मर जाने से जीवन की विपत्तियों का तो अन्त हो जाएगा। 
गौरा ने सोचा – इस स्त्री में कितना धैर्य और साहस है। फिर मैं क्यों इतनी कातर और निराश हो रही हूंजब जीवन की अभिलाषाओं का अन्त हो गया तो जीवन के अन्त का क्या डरबोली- बहनहम और तुम एक जगह रहेंगी। मुझे तो अब तुम्हारा ही भरोसा है। 
स्त्री ने कहा- भगवान का भरोसा रखो और मरने से मत डरो। 
सघन अन्धकार छाया हुआ था। ऊपर काला आकाश थानीचे काला जल। गौरा आकाश की ओर ताक रही थी। उसकी संगिनी जल की ओर। उसके सामने आकाश के कुसुम थेइसके चारों ओर अनन्तअखण्डअपार अन्धकार था। 
जहाज से उतरते ही एक आदमी ने यात्रियों के नाम लिखने शुरु किये। इसका पहनावा तो अंग्रेजी थापर बातचीत से हिन्दुस्तानी मालूम होता था। गौरा सिर झुकाये अपनी संगिनी के पीछे खड़ी थी। उस आदमी की आवाज सुनकर वह चौंक पड़ी। उसने दबी आंखों से उसको ओर देखा। उसके समस्त शरीर में सनसनी दौड़ गयी। क्या स्वप्न तो नहीं देख रही हूं। आंखों पर विश्वास न आयाफिर उस पर निगाह डाली। उसकी छाती वेग से धड़कने लगी। पैर थर-थर कांपने लगे। ऐसा मालूम होने लगामानो चारों ओर जल-ही-जल है और उसमें और उसमें बही जा रही हूं। उसने अपनी संगिनी का हाथ पकड़ लियानहीं तो जमीन में गिर पड़ती। उसके सम्मुख वहीं पुरुष खड़ा थाजो उसका प्राणधार था और जिससे इस जीवन में भेंट होने की उसे लेशमात्र भी आशा न थी। यह मंगरु थाइसमें जरा भी सन्देह न था। हां उसकी सूरत बदल गयी थी। यौवन-काल का वह कान्तिमय साहससदय छवि,नाम को भी न थी। बाल खिचड़ी हो गये थेगाल पिचके हुएलाल आंखों से कुवासना और कठोरता झलक रही थी। पर था वह मंगरु। गौरा के जी में प्रबल इच्छा हुई कि स्वामी के पैरों से लिपट जाऊं। चिल्लाने का जी चाहापर संकोच ने मन को रोका। बूढ़े ब्राह्मण ने बहुत ठीक कहा था। स्वामी ने अवश्य मुझे बुलाया था और आने से पहले यहां चले आये। उसने अपनी संगिनी के कान में कहा – बहनतुम उस ब्राह्मण को व्यर्थ ही बुरा कह रहीं थीं। यही तो वह हैं जो यात्रियों के नाम लिख रहे हैं। 
स्त्री – सचखूब पहचानी हो?गौरा – बहनक्या इसमें भी हो सकता है?स्त्री – तब तो तुम्हारे भाग जग गयेमेरी भी सुधि लेना। 
गौरा – भलाबहन ऐसा भी हो सकता है कि यहां तुम्हें छोड़ दूं?मंगरु यात्रियों से बात-बात पर बिगड़ता थाबात-बात पर गालियां देता थाकई आदमियों को ठोकर मारे और कई को केवल गांव का जिला न बता सकने के कारण धक्का देकर गिरा दिया। गौरा मन-ही-मन गड़ी जाती थी। साथ ही अपने स्वामी के अधिकार पर उसे गर्व भी हो रहा था। आखिर मंगरु उसके सामने आकर खड़ा हो गया और कुचेष्टा-पूर्ण नेत्रों से देखकर बोला तुम्हारा क्या नाम है?गौरा ने कहागौरा।
मगरू चौंक पड़ाफिर बोला – घर कहां है?मदनपुरजिला बनारस। 
यह कहते-कहते हंसी आ गयी। मंगरु ने अबकी उसकी ओर ध्यान से देखातब लपककर उसका हाथ पकड़ लिया और बोला गौरा! तुम यहां कहांमुझे पहचानती हो?गौरा रो रही थीमुहसे बात न निकलती। 
मंगरु फिर बोलातुम यहां कैसे आयीं?गौरा खड़ी हो गयीआंसू पोंछ डाले और मंगरु की ओर देखकर बोली – तुम्हीं ने तो बुला भेजा था। 
मंगरु मैंने ! मैं तो सात साल से यहां हूं। 
गौरा तुमने उसे बूढ़े ब्राह्मण से मुझे लाने को नहीं कहा था? मंगरु – कह तो रहा हूंमैं सात साल से यहां हूं। मरने पर ही यहां से जाऊंगा। भलातुम्हें क्यों बुलाता?गौरा को मंगरु से इस निष्ठुरता का आशा न थी। उसने सोचाअगर यह सत्य भी हो कि इन्होंने मुझे नहीं बुलायातो भी इन्हें मेरा यों अपमान न करना चाहिए था। क्या वह समझते हैं कि मैं इनकी रोटियों पर आयी हूंयह तो इतने ओछे स्वभाव के न थे। शायद दरजा पाकर इन्हें मद हो गया है। नारीसुलभ अभिमान से गरदन उठाकर उसने कहा- तुम्हारी इच्छा होतो अब यहां से लौट जाऊंतुम्हारे ऊपर भार बनना नहीं चाहती? मंगरु कुछ लज्जित होकर बोला – अब तुम यहां से लौट नहीं सकतीं गौरा ! यहां आकर बिरला ही कोई लौटता है। 
यह कहकर वह कुछ देर चिन्ता में मग्न खड़ा रहामानो संकट में पड़ा हुआ हो कि क्या करना चाहिए। उसकी कठोर मुखाकृति पर दीनता का रंग झलक पड़ा। तब कातर स्वर से बोला जब आ ही गयी हो तो रहो। जैसी कुछ पड़ेगीदेखी जायेगी। 
गौरा – जहाज फिर कब लौटेगा। 
मंगरु – तुम यहां से पांच बरस के पहले नहीं जा सकती। 
गौरा क्योंक्या कुछ जबरदस्ती है?मंगरु – हांयहां का यही हुक्म है। 
गौरा – तो फिर मैं अलग मजूरी करके अपना पेट पालूंगी। 
मंगरु ने सजल-नेत्र होकर कहाजब तक मैं जीता हूंतुम मुझसे अलग नहीं रह सकतीं। 
गौरा- तुम्हारे ऊपर भार बनकर न रहूंगी। 
मंगरु – मैं तुम्हें भार नहीं समझता गौरालेकिन यह जगह तुम-जैसी देवियों के रहने लायक नहीं हैनहीं तो अब तक मैंने तुम्हें कब का बुला लिया होता। वहीं बूढ़ा आदमी जिसने तुम्हें बहकायामुझे घर से आते समय पटने में मिल गया और झांसे देकर मुझे यहां भरती कर दिया। तब से यहीं पड़ा हुआ हूं। चलोमेरे घर में रहोवहां बातें होंगी। यह दूसरी औरत कौन है?गौरा – यह मेरी सखी है। इन्हें भी बूढ़ा बहका लाया। 
मंगरु -यह तो किसी कोठी में जायेंगीइन सब आदमियों की बांट होगी। जिसके हिस्से में जितने आदमी आयेंगेउतने हर एक कोठी में भेजे जायेंगे। 
गौरा – यह तो मेरे साथ रहना चाहती हैं। 
मंगरु – अच्छी बात है इन्हें भी लेती चलो। 
यत्रियों रके नाम तो लिखे ही जा चुके थेमंगरु ने उन्हें एक चपरासी को सौंपकर दोंनों औरतों के साथ घर की राह ली। दोनों ओर सघन वृक्षों की कतारें थी। जहां तक निगाह जाती थीऊख-ही-ऊख दिखायी देती थी। समुद्र की ओर से शीतलनिर्मल वायु के झोंके आ रहे थे। अत्यन्त सुरम्य दृश्य था। पर मंगरु की निगाह उस ओर न थी। वह भूमि की ओर ताकतासिर झुकायेसन्दिग्ध चवाल से चला जा रहा थामानो मन-ही-मन कोई समस्या हल कर रहा था। 
थोड़ी ही दूर गये थे कि सामने से दो आदमी आते हुए दिखाई दिये। समीप आकर दानों रुक गये और एक ने हंसकर कहा मंगरुइनमें से एक हमारी है। 
दूसरा बोला- और दूसरा मेरी। 
मंगरु का चेहरा तमतमा उठा था। भीषण क्रोध से कांपता हुआ बोला- यह दोनों मेरे घर की औरतें है। समझ गये?इन दोनों ने जोर से कहकहा मारा और एक ने गौरा के समीप आकर उसका हाथ पकड़ने की चेष्टा करके कहा- यह मेरी हैं चाहे तुम्हारे घर की होचाहे बाहर की। बचाहमें चकमा देते हो। 
मंगरु – कासिमइन्हें मत छेड़ोनहीं तो अच्छा न होगा। मैंने कह दियामेरे घर की औरतें हैं। 
मंगरी की आंखों से अग्नि की ज्वाला-सी निकल रही थी। वह दानों के उसके मुख का भाव देखकर कुछ सहम गये और समझ लेने की धमकी देकर आगे बढ़े। किन्तु मंगरु के अधिकार-क्षेत्र से बाहर पहुंचते ही एक ने पीछे से ललकार कर कहा- देखें कहां ले के जाते हो?मंगरू ने उधर ध्यान नहीं दिया। जरा कदम बढ़ाकर चलने लगाजेसे सन्ध्या के एकान्त में हम कब्रिस्तान के पास से गुजरते हैंहमें पग-पग पर यह शंका होती है कि कोई शब्द कान में न पड़ जायकोई सामने आकर खड़ा न हो जायकोई जमीन के नीचे से कफन ओढ़े उठ न खड़ा हो। 
गौरा ने कहाये दानों बड़े शोहदे थे। 
मंगरु – और मैं किसलिए कह रहा था कि यह जगह तुम-जैसी स्त्रियों के रहने लायक नहीं है। 
सहसा दाहिनी तरफ से एक अंग्रेज घोड़ा दौड़ाता आ पहुंचा और मंगरु से बोला- वेल जमादारये दोनों औरतें हमारी कोठी में रहेगा। हमारे कोठी में कोई औरत नहीं है। 
मंगरु ने दोनों औरतों को अपने पीछे कर लिया और सामने खड़ा होकर बोला--साहबये दोनों हमारे घर की औरतें हैं। 
साहब- ओ हो ! तुम झूठा आदमी। हमारे कोठी में कोई औरत नहीं और तुम दो ले जाएगा। ऐसा नहीं हो सकता। ( गौरा की ओर इशारा करके) इसको हमारी कोठी पर पहुंचा दो। 
मंगरु ने सिर से पैर तक कांपते हुए कहा- ऐसा नहीं हो सकता। 
मगर साहब आगे बढ़ गया थाउसके कान में बात न पहुंची। उसने हुक्म दे दिया था और उसकी तामील करना जमादार का काम था। 
शेष मार्ग निर्विघ्न समाप्त हुआ। आगे मजूरों के रहने के मिट्ठी के घर थे। द्वारों पर स्त्री-पुरुष जहां-तहां बैठे हुए थे। सभी इन दोनों स्त्रियों की ओर घूरते थे और आपस में इशारे करते हंसते थे। गौरा ने देखाउनमें छोटे-बड़े का लिहाज नहीं हैन किसी के आंखों में शर्म है। 
एक भदैसले और ने हाथ पर चिलम पीते हुए अपनी पडोसिन से कहा- चार दिन की चांदनीफिर अंधेरी पाख ! 
दूसरी अपनी चोटी गूंथती हुई बोली – कलोर हैं न। 

मंगरु दिन-भर द्वार पर बैठा रहामानो कोई किसान अपने मटर के खेत की रखवाली कर रहा हो। कोठरी में दोनों स्त्रियां बैठी अपने नसीबों को रही थी। इतनी देर में दोनों को यहां की दशा का परिचय कराया गया था। दोनों भूखी-प्यासी बैठी थीं। यहां का रंग देखकर भूख प्यास सब भाग गई थी। 
रात के दस बजे होंगे कि एक सिपाही ने आकर मंगरु से कहा- चलोतुम्हें जण्ट साहब बुला रहे हैं। 
मंगरु ने बैठे-बैठे कहा – देखो नब्बीतुम भी हमारे देश के आदमी हो। कोई मौका पड़ेतो हमारी मदद करोगे नजाकर साहब से कह दोमंगरु कहीं गया हैबहुत होगा जुरमाना कर देंगे। 
नब्बी – न भैयागुस्से में भरा बैठा हैपिये हुए हैंकहीं मार चलेतो बसचमड़ा इतना मजबूत नहीं है। 
मंगरु – अच्छा तो जाकर कह दोनहीं आता। 
नब्बी- मुझे क्याजाकर कह दूंगा। पर तुम्हारी खैरियत नहीं है के बंगले पर चला। यही वही साहब थेजिनसे आज मंगरु की भेंट हुई थी। मंगरु जानता था कि साहब से बिगाड़ करके यहां एक क्षण भी निर्वाह नहीं हो सकता। जाकर साहब के सामने खड़ा हो गया। साहब ने दूर से ही डांटावह औरत कहां हैतुमने उसे अपने घर में क्यों रखा है?मंगरु – हजूरवह मेरी ब्याहता औरत है। 
साहब – अच्छावह दूसरा कौन है? मंगरु – वह मेरी सगी बहन है हजूर !
साहब – हम कुछ नहीं जानता। तुमको लाना पड़ेगा। दो में से कोईदो में से कोई। 
मंगरु पैरों पर गिर पड़ा और रो-रोकर अपनी सारी राम कहानी सुना गया। पर साहब जरा भी न पसीजे! अन्त में वह बोला – हुजूरवह दूसरी औरतों की तरह नहीं है। अगर यहां आ भी गयीतो प्राण दे देंगी। 
साहब ने हंसकर कहा – ओ ! जान देना इतना आसान नहीं है ! 
नब्बी – मंगरु अपनी दांव रोते क्यों होतुम हमारे घर नहीं घुसते थे! अब भी जब घात पाते होजा पहुंचते हो। अब क्यों रोते हो?एजेण्ट – यह बदमाश है। अभी जाकर लाओनहीं तो हम तुमको हण्टरों से पीटेगा। 
मंगरु – हुजूर जितना चाहे पीट लेंमगर मुझसे यह काम करने को न कहेंजो मैं जीते जी नहीं कर सकता !
एजेण्ट- हम एक सौ हण्टर मारेगा। 
मंगरु – हुजूर एक हजार हण्टर मार लेंलेकिन मेरे घर की औरतों से न बोंले। 
एजेण्ट नशे में चूर था। हण्टर लेकर मंगरु पर पिल पड़ा और लगा सड़ासड़ जमाने। दस बाहर कोड़े मंगरु ने धैर्य के साथ सहेफिर हाय-हाय करने लगा। देह की खाल फट गई थी और मांस पर चाबुक पड़ता थातो बहुत जब्त करने पर भी कण्ठ से आर्त्त-ध्वनि निकल आती थी टौर अभी एक सौं में कुछ पन्द्रह चाबुक पड़े थें। 
रात के दस बज गये थे। चारों ओर सन्नाटा छाया था और उस नीरव अंधकार में मंगरु का करुण-विलाप किसी पक्ष की भांति आकाश में मुंडला रहा था। वृक्षों के समूह भी हतबुद्धि से खड़े मौन रोन की मूर्ति बने हुए थे। यह पाषाणहृदय लम्पटविवेक शून्य जमादार इस समय एक अपरिचित स्त्री के सतीत्व की रक्षा करने के लिए अपने प्राण तक देने को तैयार थाकेवल इस नाते कि यह उसकी पत्नी की संगिनी थी। वह समस्त संसार की नजरों में गिरना गंवारा कर सकता थापर अपनी पत्नी की भक्ति पर अखंड राज्य करना चाहता था। इसमें अणुमात्र की कमी भी उसके लिए असह्य थी। उस अलौकिक भक्ति के सामने उसके जीवन का क्या मूल्य था?ब्राह्मणी तो जमीन पर ही सो गयी थीपर गौरा बैठी पति की बाट जोह रही थी। अभी तक वह उससे कोई बात नहीं कर सकी थी। सात वर्षों की विपत्तिकथा कहने और सुनने के लिए बहुत समय की जरुरत थी और रात के सिवा वह समय फिर कब मिल सकता था। उसे ब्राह्मणी पर कुछ क्रोध-सा आ रहा था कि यह क्यों मेरे गले का हार हुईइसी के कारण तो वह घर में नहीं आ रहे हैं। 
यकायक वह किसी का रोना सुनकर चौंक पड़ी। भगवान्इतनी रात गये कौन दु:ख का मारा रो रहा है। अवश्य कोई कहीं मर गया है। वह उठकर द्वार पर आयी और यह अनुमान करके कि मंगरु यहां बैठा हुआ हैबोली – वह कौन रो रहा है ! जरा देखो तो। 
लेकिन जब कोई जवाब न मिलातो वह स्वयं कान लगाकर सुनने लगी। सहसा उसका कलेजा धक् से हो गया। तो यह उन्हीं की आवाज है। अब आवाज साफ सुनायी दे रही थी। मंगरु की आवाज थी। वह द्वार के बाहर निकल आयी। उसके सामने एक गोली के अम्पें पर एजेंट का बंगला था। उसी तरफ से आवाज आ रही थी। कोई उन्हें मार रहा है। आदमी मार पड़ने पर ही इस तरह रोता है। मालूम होता हैवही साहब उन्हें मार रहा है। वह वहां खड़ी न रह सकीपूरी शक्ति से उस बंगले की ओर दौड़ीरास्ता साफ था। एक क्षण में वह फाटक पर पहुंच गयी। फाटक बंद था। उसने जोर से फाटक पर धक्का दियालेकिन वह फाटक न खुला और कई बार जोर-जोर से पुकारने पर भी कोई बाहर न निकलातो वह फाटक के जंगलों पर पैर रखकर भीतर कूद पड़ी और उस पार जाते हीं उसने एक रोमांचकारी दृश्य देखा। मंगरु नंगे बदन बरामदे में खड़ा था और एक अंग्रेज उसे हण्टरों से मार रहा था। गौरा की आंखों के सामने अंधेरा छा गया। वह एक छलांग में साहब के सामने जाकर खड़ी हो गई और मंगरु को अपने अक्षय- प्रेम-सबल हाथों से ढांककर बोली सरकारदया करोइनके बदले मुझे जितना मार लोपर इनको छोड़ दो। 
एजेंट ने हाथ रोक लिया और उन्मत्त की भांति गौरा की ओर कई कदम आकर बोला- हम इसको छोड़ देंतो तुम मेरे पास रहेगा। 
मंगरु के नथने फड़कने लगे। यह पामरनीचअंग्रेज मेरी पत्नी से इस तरह की बातें कर रहा है। अब तक वह जिस अमूल्य रत्न की रक्षा के लिए इतनी यातनांए सह रहा थावही वस्तु साहब के हाथ में चली जा रही हैयह असह्य था। 

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