Skip to main content

अमीर खुसरो

Comments

Popular posts from this blog

दो बैलों की कथा

जानवरों में गधा सबसे ज्यादा बुद्धिमान समझा जाता है। हम जब किसी आदमी को पहले दर्जे का बेवकूफ कहना चाहते हैं ,  तो उसे गधा कहते हैं। गधा सचमुच बेवकूफ है या उसके सीधेपन ,  उसकी निरापद सहिष्णुता ने उसे यह पदवी दे दी है ,  इसका निश्चय नहीं किया जा सकता। गायें सींग मारती हैं ,  ब्याही हुई गाय तो अनायास ही सिंहनी का रूप धारण कर लेती है। कुत्ता भी बहुत गरीब जानवर है ,  लेकिन कभी-कभी उसे भी क्रोध आ ही जाता है ,  किन्तु गधे को कभी क्रोध करते नहीं सुना ,  न देखा। जितना चाहो गरीब को मारो ,  चाहे जैसी खराब ,  सड़ी हुई घास सामने डाल दो ,  उसके चेहरे पर कभी असंतोष की छाया भी नहीं दिखाई देगी। वैशाख में चाहे एकाध बार कुलेल कर लेता है ,  पर हमने तो उसे कभी खुश होते नहीं देखा। उसके चेहरे पर स्थाई विषाद स्थायी रूप से छाया रहता है। सुख-दुःख ,  हानि-लाभ किसी भी दशा में उसे बदलते नहीं देखा। ऋषियों-मुनियों के जितने गुण हैं ,  वे सभी उसमें पराकाष्ठा को पहुँच गए हैं ,  पर आदमी उसे बेवकूफ कहता है। सद्गुणों का इतना अनादर!   कदाचित सीधाप...

लॉटरी

ज ल्दी से मालदार हो जाने की हवस किसे नहीं होती  ?  उन दिनों जब लॉटरी के टिकट आये ,  तो मेरे दोस्त ,  वि क्रम के पिता ,  चचा ,  अम्मा ,  और भाई ,  सभी ने एक-एक टिकट खरीद लिया। कौन जाने ,  किसकी तकदीर जोर करे  ?  किसी के नाम आये ,  रुपया रहेगा तो घर में ही। मगर वि क्रम को सब्र न हुआ। औरों के नाम रुपये आयेंगे ,  फिर उसे कौन पूछता है  ?  बहुत होगा ,  दस-पाँच हजार उसे दे देंगे। इतने रुपयों में उसका क्या होगा  ?  उसकी जिन्दगी में बड़े-बड़े मंसूबे थे। पहले तो उसे सम्पूर्ण जगत की यात्रा करनी थी ,  एक-एक कोने की। पीरू और ब्राजील और टिम्बकटू और होनोलूलू ,  ये सब उसके प्रोग्राम में थे। वह आँधी की तरह महीने-दो-महीने उड़कर लौट आनेवालों में न था। वह एक-एक स्थान में कई-कई दिन ठहरकर वहाँ के रहन-सहन ,  रीति-रिवाज आदि का अध्ययन करना और संसार-यात्रा का एक वृहद् ग्रंथ लिखना चाहता था। फिर उसे एक बहुत बड़ा पुस्तकालय बनवाना था ,  जिसमें दुनिया-भर की उत्तम रचनाएँ जमा की जायँ। पुस्तकालय के लिए वह दो ल...

स्वर्ग की देवी

भाग्य की बात! शादी-विवाह में आदमी का क्या अख्तियार! जिससे ईश्वर ने, या उनके नायबों- ब्राह्मणों ने तय कर दी, उससे हो गयी। बाबू भारतदास ने लीला के लिए सुयोग्य वर खोजने में कोई बात उठा नहीं रखी। लेकिन जैसा घर-वर चाहते थे, वैसा न पा सके। वह लड़की को सुखी देखना चाहते थे, जैसा हर एक पिता का धर्म है; किंतु इसके लिए उनकी समझ में सम्पत्ति ही सबसे जरूरी चीज थी। चरित्र या शिक्षा का स्थान गौण था। चरित्र तो किसी के माथे पर लिखा नहीं रहता और शिक्षा का आजकल के जमाने में मूल्य ही क्या? हाँ, सम्पत्ति के साथ शिक्षा भी हो तो क्या पूछना! ऐसा घर उन्होंने बहुत ढूँढ़ा, पर न मिला। ऐसे घर हैं ही कितने जहाँ दोनों पदार्थ मिलें? दो-चार मिले भी तो अपनी बिरादरी के न थे। बिरादरी भी मिली, तो ज़ायजा न मिला; जायजा भी मिला तो शर्तें तय न हो सकीं। इस तरह मजबूर होकर भारतदास को लीला का विवाह लाला सन्तसरन के लड़के सीतासरन से करना पड़ा। अपने बाप का इकलौता बेटा था, थोड़ी-बहुत शिक्षा भी पायी थी, बातचीत सलीके से करता था, मामले-मुकदमे समझता था और जरा दिल का रँगीला भी था। सबसे बड़ी बात यह थी कि रूपवान, बलिष्ठ, प्रसन्न-मुख, साहसी आदमी ...